किसान आंदोलन के चलते 2021 का वर्ष ऐतिहासिक माना जाएगा।
15/01/2022
बहनो भाइयो, किसान आंदोलन के चलते 2021 का वर्ष ऐतिहासिक माना जाएगा। विश्व का सबसे बड़ा किसान आंदोलन एक वर्ष से भी अधिक समय तक चला। किसान आंदोलन कुल मिलाके पूरे भारत में अहिंसक और शांतिपूर्वक रहे। किसानों ने एमएसपी और कुछ अन्य मांगों सहित 3 कृषि कानूनों के विरोध में आंदोलन किए जो सरकार ने किसानों से बिना विचार-विमर्श किए संसद में पास करवा दिये थे। आरोप ये भी लगते हैं कि तीनों कृषि कानूनों को बनाने से पहले संसद में विपक्षी नेताओं को भी भरोसे में नहीं लिया गया। किसान आंदोलन के समक्ष अहंकारी सरकार को झुकना ही नहीं घुटने टेकने पड़े, और सरकार के ही बनाए हुए तीनों कानूनों को प्रधानमंत्री ने क्षमा मांगते हुए वापस लेने की घोषणा करी।
सरकार ने कृषि बिलों को पास करवाना भी ऐतिहासिक निर्णय माना और किसान आंदोलन के दबाव में कृषि बिलों को वापस लेना भी ऐतिहासिक ही माना, दोनों स्थितियों में निर्णय ऐतिहासिक कैसे हो सकते हैं? सत्ताधारी नेताओं ने अपने संवैधानिक अधिकारों का दुरूपयोग करके कृषि बिल पास करवाये और वापस भी लिये, क्या ऐसे नेताओं के मार्गदर्शन से भारत विश्वगुरू बनेगा? कृषि बिलों को पास करवाते समय भी, और वापस लेते समय भी सरकार के समर्थक किसी एक सांसद ने भी विरोध करने का साहस नहीं किया, सभी सांसदों ने नतमस्तक होकर गुलामों की तरह अपने नेता का समर्थन किया, मानो हमने चुनावों में अपने प्रतिनिधि न चुनकर सरकार की गुलामी करने के लिए गुलाम चुने हों। गुलामी के लोकतंत्र का कैसा विचित्र उदाहरण है हमारी गठबंधन की राजनीतिक व्यवस्था!
किसान आंदोलन के चलते सत्ताधारी नेताओं ने किसानों को आतंकवादी, उग्रवादी,पाकिस्तानी, खालिस्तानी, मवाली आदि कहकर अपमानित किया। आंदोलन में लगभग 700 गरीब किसानों की असामयिक मृत्यु हो गयी, लाखों करोड़ों की हानि होने के साथ आम लोगों ने आवागमन में असहनीय कठिनाइयों को भी झेला, परन्तु कठिनाईयों को सहन करते हुए भी सभी की सहानुभूति किसानों के साथ बनी रही। एक दूसरे के प्रति सहयोग, सहायता और सहनशीलता का प्रशंसनीय उदाहरण देखने को मिला। आंदोलन में गुरूद्वारों की लंगर सेवा के लिए जितनी भी प्रशंसा करी जाए, जितना भी धन्यवाद किया जाय कम है।
आजादी से आज तक आंदोलनों की भरमार रही, अनगिनत किसानों के आंदोलन के साथ कभी मजदूर, कभी रेल कर्मचारी, कभी बैंक कमचारी, कभी सफाई कर्मचारी, कभी हाॅस्पिटल कर्मचारी, कभी वकीलों के आंदोलन और कभी सरकारी कर्मचारियों के आन्दोलन सहित देश का हर वर्ग आंदोलन के माध्यम से ही न्यायप्रिय व लोकप्रिय व्यवस्था की खोज में लगा हुआ है। समाज का एक भी वर्ग ऐसा देखने में नहीं आता जो वर्तमान राजनीतिक सरकारी व्यवस्था से संतुष्ट हो। आजादी से पहले भी आंदोलन होते थे और आजादी के पश्चात भी आंदोलन ही हो रहे हैं, तो क्या आंदोलन करते रहने के लिए ही आजादी ली थी? हमने ऐसी राजनीतिक व्यवस्था को स्वीकार किया हुआ है जिसमें मुट्ठीभर धनाड्डयों को छोड़कर गरीब,किसान, मजदूर और साधारण नागरिक के हित में कुछ भी नहीं है।
किसान नेता केवल आंदोलन में रूचि रखते हैं न कि राजनीति में, किसान नेताओं के राजनीति नहीं करने का सीधा-सीधा अर्थ ये निकलता है कि सभी किसान नेता गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति के समर्थक हैं, और राजनीति न करके किसान नेता भ्रष्ट राजनीति करने वाले किसी न किसी नेता का समर्थन या विरोध करना चाहते हैं। राजनीति न करना भी अपने आप में राजनीति ही होती है। किसान नेता समस्याओं का समाधान चाहते हैं या आंदोलन की राजनीति करके सुर्खियों में बने रहना? राजनीति न करने के कारण ही समस्याओं के समाधान नहीं हो रहे, जिस जगत को पेट भरने के लिए आप धरती पर अपनी मेहनत से अनाज पैदा करके देते हो, तो क्या गरीबों और गरीब किसानों को न्यायप्रिय राजनीतिक व्यवस्था देने का दायित्व किसान नेताओं पर नहीं है? किसान नेताओं ने राजनीति से विमुख होकर गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति करने वाले नेताओं को, गरीबों को लूटने के लिए खुला मैदान छोड़ दिया। मेरे प्रिय किसान नेताओ आप इस भूल में तो मत रहना कि राजनीति किए बिना केवल आंदोलन के भरोसे एमएसपी का रसगुल्ला आपके मुंह में आजाएगा। समझकर ~सत्य बहुमत~ की राजनीति करो, सभी समस्याओं का समाधान होने के साथ एमएसपी आपके कदमों में अपने आप आकर गिर जाएगी।
मेरे प्रिय किसान भाइयो कुल 543 सांसदों में 350 से भी अधिक सांसद आपके समर्थन और वोटों से चुने हुए हैं, जिन्होंने सरकार बना रखी है, पश्चात इसके भी आपको उचित मांगों के लिए अपनी ही चुनी हुई सरकार के आगे आंदोलन करने पड़ते हैं, निश्चित ही हमारी राजनीतिक व्यवस्था लोकतांत्रिक व न्यायप्रिय नहीं है। किसान नेता यदि राजनीति करते तो आंदोलन करने की आवश्यकता ही नहीं थी। सबसे अधिक मूल्यवान समय होता है, जन्म से लेकर मृत्यु तक ईश्वर ने ऐसी लाइन खींच रखी है जिसे ईश्वर स्वयं भी नहीं बदल सकते। समय का उपयोग कैसे करना है इसका निर्णय ईश्वर ने हम सबके विवेक पर छोड़ रखा है, समय का उपयोग आंदोलन में करना है या अच्छी राजनीति में, इसका निर्णय हमें लेना है। आंदोलन में समय का केवल उपयोग होता है और अच्छी राजनीति में सदुपयोग। समझना बस इतना है कि गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति करके, समय का केवल उपयोग करना है, या गठबंधनमुक्त ~सत्य बहुमत~ की राजनीति करके सदुपयोग। ~सत्य बहुमत~ की राजनीति में आंदोलन में समय बर्बाद करने का कोई स्थान नहीं है।
आंदोलन में समय बर्बाद न करके मेरी किसान भाइयों, बहनों, मजदूरों और युवाओं सहित सभी देशवासियों से अपील है कि षड़यंत्रकारी गठबंधन की भ्रष्ट राजनीति को जड़ से समाप्त करने के लिए, गठबंधन की राजनीति से मुक्त ~सत्य बहुमत पार्टी~ से जुड़कर चुनावों में भाग लें।
~सत्य बहुमत पार्टी~ को अपना समर्थन, सहयोग व वोट देकर सच्चे लोकतंत्र और न्यायप्रिय राजनीतिक व्यवस्था के निर्माण में भागीदार बनें। ~सत्य बहुमत~ की राजनीति पर चर्चा करने के लिए समय निश्चित करके आप कभी भी मेरे से मिलने का कार्यक्रम बना सकते हैं। आंदोलन में दिवंगत किसान परिवारों के प्रति सहानुभूति व संवेदना प्रकट करते हुए, अनेकों अनेक शुभकामनाओं सहित परमपिता परमेश्वर हम सबको स्वस्थ व प्रसन्न रखे।
किसान भाइयो याद रखना गठबंधन की राजनीति समस्या है, और सत्य बहुमत समाधान
गठबंधनमुक्त ~सत्य बहुमत~ जिन्दाबाद-जिन्दाबाद
